उद्धरण - 791

गयादीन गाँव के महाजन ज़रूर थे, पर वैसे महाजन न थे जिनके किसी ओर निकलने पर पन्थ बन जाता है। वे उस जत्थे के महाजन थे जो अनजानी राह पर पहले किराये के जन भेजते हैं और जब देख लेते हैं कि उस पर पगडण्डी बन गई है और उसके धँसने का खतरा नहीं है, तब वे महाजन की तरह छड़ी टेक-टेककर धीरे-से निकल जाते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549