उद्धरण - 836

ऐसी की तैसी दुनिया की। सोच ही सब रोगों की जड़ है, वही तो है जिससे छुटकारा लेना चाहिए । पाप-पुण्य क्या है? सोचें तो चोरी है, सोचें तो ठीक है । सब चोर हैं, सब भले हैं ।

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