उद्धरण - 668

वह आते ही कोशिश करने लगा कि उनके साथ एकात्म, एक प्राण हो सके। होस्टल के लड़कों से मिलकर उनके विचार जानने की, उनके आदर्श और उनकी कामनाएँ समझने की, उसने चेष्टा की। स्वीकृति पाना, स्वागत पाना, मान्य होना, कितना अच्छा था....... ... ... ... ... ... ...शीघ्र ही शेखर ने पाया कि उसे कालेज के अधिकांश लड़के जानते हैं, और वैसे नहीं जानते, जैसे मद्रास में जानते थे....उसे अपने आपसे सन्तोष-सा होने लगा।

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