उद्धरण - 758
भारत का समाज कितना क्षुद्रहृदय है? किस्से-कहानियों में, बातों में तो कहते हैं, प्रेम बड़ा भारी आदर्श है, इसके आगे सब कुछ तुच्छ है। पर जब वास्तव में कोई बात सामने आती है, तब कितनी जल्दी पंचायत बिठाकर बिरादरी से बाहर करने की सूझती है, कितनी कठोरता से नैतिक स्वातन्त्र्य का दमन किया जाता है!
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