उद्धरण - 792

शिक्षा देना संसार अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझता है, किन्तु शिक्षा अपने मन की, शिष्य के मन की नहीं। क्योंकि संसार का ‘आदर्श व्यक्ति’ व्यक्ति नहीं है, एक ‘टाइप’ है, और संसार चाहता है कि सर्वप्रथम अवसर पर ही प्रत्येक व्यक्ति को ठोक-पीटकर, उसका व्यक्तित्व कुचलकर, उसे उस टाइप में सम्मिलित कर लिया जाय।

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