उद्धरण - 864

एक हम हैं कि आते हैं तब रोना-चिल्लाना और दर्द; जाते हैं तब रोना, पीटना और तड़पन; रहते हैं तब झींकना, कलपना और हो हल्ला। पर इनका जीवन कितना सरल होता है! दिन-भर भूखे रहते हैं, दुःख झेलते हैं, रोते-कलपते हैं; किन्तु जब रात को सोने लगते हैं, तब शान्त और सन्तुष्ट! इनका जीवन कैसा सदा प्रेम से भरा रहता होगा- इनके जीवन में तो एक ही भावना होती होगी-- प्रेम की । लोभ, मोह और क्रोध के लिए इनमें स्थान कहाँ होगा?

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