उद्धरण - 823

यह भला कौन कह सकता है कि किशोर बाबू की जिंदगी के ये पचास साल भारतवर्ष के ‘लोकतंत्र‘ के पचास सालों की तरह रहे हैं, जिनमें आजादी की लड़ाई के आदर्शों की खुरचन तक नहीं रही।

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