उद्धरण - 678
एक छोटे क्षण-भर के लिए मैं स्तब्ध हो गया, फिर एकाएक मेरे मन ने, मेरे समूचे अस्तित्व ने, विद्रोह के स्वर में कहा- मेरे मन के भीतर ही, बाहर एक शब्द भी नहीं निकला- ‘माँ, युवती माँ, यह तुम्हारे हृदय को क्या हो गया है जो तुम अपने एकमात्र बच्चे के गिरने पर ऐसी बात कह सकती हो- और यह अभी, जब तुम्हारा सारा जीवन तुम्हारे आगे है!
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