सन्तान को पढ़ा-लिखा कर फिर अपनी इच्छा पर चलाना चाहने का मतलब है स्वयं अपनी दी हुई शिक्षा-दीक्षा को अमान्य करना, अपने को अमान्य करना, क्योंकि बीस बरस में माँ-बाप सन्तान को स्वतंत्र विचार करना भी न सिखा सके तो उन्होंने क्या सिखाया?
तुम निजी इच्छाओं की पूर्ति और उससे प्राप्त क्षणिक सन्तोष तृप्ति को राष्ट्र, समाज और मनावता की सेवा से क्यों जोड़ते हो, एक में निजी प्रतिशोध का सुख है और दूसरे में मानव अस्तित्व की गरिमा का आनन्द। करोड़ों आम लोगों से जुड़ने की दिव्य अनुभूति! यह सही है कि तुम्हारे साथ बड़ा घृणित व्यवहार किया गया है लेकिन यह समझ लो कि यह सुलूक इसलिए नहीं हुआ कि तुम ऊँचे कुल में पैदा हुए हो, तुम ब्राह्मण हो उसका स्पष्ट कारण यह है कि तुम अपने देश की आजादी, देश के लोगों का कल्याण चाहते हो!
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