उद्धरण - 725

मैं सोचता, यह दुनिया में क्या-क्या हमने खड़ा कर लिया है जो दो के मनों के स्नेह को ऐसे फाड़ देता है। मन क्या फटने के लिए है ! क्या वे आपस में रहने के लिए नहीं है।

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