उद्धरण - 621

ज्ञानीजन कह गये हैं कि परम कल्याणमय ही इस सृष्टि में अपनी परम-लीला का विस्तार कर रहा है। मैं जान लेता हूँ कि ऐसा ही है। न मानूँ, तो जीऊँ कैसे? पर रह रहकर जी होता है कि पुकारकर कहूँ कि हे परम कल्याणमय, तेरी कल्याणी लीला को मैं नहीं जानता हूँ, फिर भी रोने-बिलखने की आवाज तो चारों ओर से मेरे कानों में भरी आ रही है। यह क्या है, ओ जगत्पिता! तेरी लीला के नीचे यह सब आर्तनाद क्या है?

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