उद्धरण - 862
दूर से देखा जाए, तो मानवता का सारा विकास ही कम से कम अभी तक, यही है। मानवता कुछ चाहती है, लेकिन जानती नहीं कि क्या, और उसे जानने की खोज में, अनेक रास्ते पर एक साथ ही भटक रही है....मानो सारी मानवता, अपने जीवन की गति में, किसी दीर्घ वयःसन्धि् पर खड़ी है और अपने से उलझ रही है, उसका यौवन उसके कृतित्व के दिन अभी आगे हैं।
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