उद्धरण - 896
हमारा देश भुनभुनानेवालों का देश है। दफ़्तरों और दुकानों में, कल-कारखानों में, पार्कों और होटलों में, अख़बारों में, कहानियाँ और अ-कहानियों में चारों तरफ़ लोग भुनभुना रहे हैं। यही हमारी युग-चेतना है और इसे वह अच्छी तरह से जानता था।
लगभग सभी किसी-न-किसी तकलीफ़ में थे और कोई भी तकलीफ़ की जड़ में नहीं जाता था। तकलीफ़ का जो भी तात्कालिक कारण हाथ लगे, उसे पकड़कर भुनभुनाना शुरू कर देता था।
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