उद्धरण - 932
फाँसी!
यौवन के ज्वार में समुद्र-शोषण। सूर्योदय पर रजनी के उलझे हुए और घनी छायाओं से भरे कुन्तल। शारदीय नभ की छटा पर एक भीमकाय काला बरसाती बादल। इस विरोध में, इस अचानक खण्डन में निहित अपूर्व भैरव कविता ही में इसकी सिद्धि है......
सिद्धि कैसी-काहे की, मेरी मृत्यु की क्या सिद्धि होगी। मेरे जीवन की क्या थी।
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