उद्धरण - 974

मुझमें जीवन नहीं है, किन्तु मैं जीवन देने की उतनी ही क्षमता रखती हूँ, जितनी उसे छीन लेने की, विनष्ट करने की, मेरा काम है तोड़ना, मेरा आविष्कार ही इसीलिए हुआ है । किन्तु जब मैं बनाती हूँ, तब जो कुछ मैं बनाती हूँ, वह अखण्ड और अजेय होता है। मैं स्वयं पत्थर की हूँ, वज्रहृदया हूँ, इसलिए मेरी रचनाएँ भी वज्र की सहिष्णुता रखने वाली होती हैं।

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