उद्धरण - 720
भुवन अकेला है, घर-गिरस्ती की चिन्ताएँ उस ने जानी नहीं, दुख की दूर से रोमांटिक कल्पना की है, इसी लिए बातें बना सकता है। अगर सचमुच दुख उस ने जाना होता- दुख कैसे तोड़कर, चूर-चूर कर के रख देता है, दृष्टि देना तो क्या, आँखों को अन्ध कर के, पपोटे निकाल कर उन में कींचड़ भर देता है, यह देखा होता- तो उस की जबान ऐंठ जाती.....
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