उद्धरण - 793
जिस समाज को उसे बदलना है, उसी की वह एक स्वतंत्र इकाई है......यह विचार कोई असाधारण विचार नहीं था, पर इसमें शेखर का समूचा आग्रह समाज पर नहीं स्वतंत्र इकाई पर था, इसलिए उसे यह नया मालूम हुआ। स्वतंत्र होना, इकाई होना, अपने आप को एक खण्ड, एक टुकड़ा, अस्तित्व का एक अल्पांश न देखकर समूचा देखना- चाहे एक अकेला कण, किन्तु सम्पूर्ण जिसका एक स्पष्ट वास्तविक रूप है, एक छोटे से अस्तित्व का पृथक तेजपुंज।
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