उद्धरण - 897

....जो भी शिक्षित हैं, जो संस्कारी जीवन के सूक्ष्मतर स्पन्दनों को पहचानते हैं, वे स्पन्दन जो निरे शिष्ट लोकाचार से कुछ गहरे हैं, वे जीवन के महान क्षणों में-प्रेम के या किसी भी गहरे भाव के विलोड़न के क्षण में सहसा पाते हैं कि उसमें पूर्णता नहीं है, तन्मयता, चूड़ान्त तद्गति नहीं है, है एक अद्भुत असंगत तटस्थता, स्वयं अपने भावों से एक प्रकार का अलगाव, जो कर्ता को ही कर्म का दर्शक और आलोचक बना देता है--अर्थात अपने को अपनेपन की सम्पूर्णता से बहिष्कृत कर देता है......

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