उद्धरण - 928

इस देश की मिट्टी की तासीर ही शायद कुछ ऐसी है कि बड़े-से-बड़े क्रांतिकारी और धर्म को अफीम माननेवालों तक की नाव अंत में इसी ठांव पर आ लगती है। किशोर बाबू इन दिनों सिर्फ एक ही पुस्तक का अध्ययन-पठन-मनन कर रहे है और वह है -‘श्रीमद्भगवत्गीता।‘

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