उद्धरण - 909
बाद में जब इमरजेन्सी हटी तो नाइयों की दुकानों पर ऐसी भीड़ उमड़ी कि लग रहा था कि तानाशाही के ख़ात्मे का जश्न मनाने वालों के जुलूस निकलें हों। सैलूनों के सामने लम्बी लम्बी लाइनें इतनी जोशीली, अनुशसित और उमंगभरी थीं कि भ्रम होता था कि पंक्तियों में खड़े इन्सान बाल कटाने नहीं मतदान के लिए लाइन में खड़े है।
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