उद्धरण - 970

कितनी गहरी है नीलिमा आकाश की- उस आकाश की जो आँखों के भीतर समा जाता है, कितनी स्निग्ध है तरलता जल की- उस जल की जिसमें चेतना डूब जाती है, कितना सुन्दर है जलकुम्भी का खोया हुआ फूल, वह फूल जो जीवन का प्रतीक है, कितना रसमय, स्फूर्तिमय है विस्तार अवचेतन का ।

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