उद्धरण - 985

बुझते समय दीपक का आलोक सहसा दीप्त हो उठता है, किन्तु दीपक आजीवन उसी प्रखरतर दीप्ति से नहीं जल सकता ।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549