उद्धरण - 724
सामाजिक से मेरा मतलब किसी एक समाज का नहीं है। मेरा मतलब उस सारे संगठन से है, जिसका एक अंग हम- मानव मात्र हैं। इस दृष्टि से जहाँ हत्या अहिंसा हो सकती है, वहाँ राह चलते, गेहूँ की एक बाल तोड़कर फेंक देना हिंसा होगी, क्योंकि वह कर्म उस विश्व समाज का कोई हित नहीं करता, उल्टे थोड़े से हित की सम्भावना को नष्ट कर देता है।
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