उद्धरण - 952
... जब सुबह घर से निकले हुए परिन्दों को देखने की हमें फु़र्सत नहीं फिर शाम को घर लौटती उनकी क़तारों पर निगाह डालने का इतमीनान कहां से आयेगा।
उसका मन कांप गया : क्या मेरे घर छोड़ने के बाद भी रोज़ वरुणा के समय पर किवाड़ खुले रखे जाते होंगे। भीतर घर की फ़र्शें उसके क़दमों की प्रतीक्षा करती होंगी।
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