उद्धरण - 867

जब सूर्य मुझसे मिला था तब उसमें कितने सारे अपनों का प्यार, इज़्ज़त और आशीष था, उसके अंदर कितने सारे पुरखे थे और उनका संचित था। स्मृतियों की ऊंची तथा अभेद्य दीवारों के भीतर तमाम रिश्तों के ज़िरहबख्तर से लैस था वह। पर कैसे वे समस्त मिल कर मेरी एक चितवन के सामने कारगर न हुए- सूर्य मेरा हो गया।

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