उद्धरण - 779

हमारा भारतीय जीवन और दर्शन अन्तर्मुखी और व्यक्तिवादी है- जैसे, हम मुक्ति का साधन यही मानते हैं कि जहाँ तक हो सके, अपने को समाज से अलग खींच लें और ‘आत्मानं विद्ध।’ इस व्यक्तिवाद का परिणाम है कि हम पाप पुण्य भी व्यक्ति गत ही समझते हैं।

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