उद्धरण - 817
सम्पूर्ण तटस्थ भाव से तो कुछ देखा नहीं जाता, हम अनजाने कथावस्तु पर अपना आरोप करते चलते हैं, या फिर अपने पर ही कथा की घटनाएँ घटित करते चलते हैं- और मन की यह भी एक शक्ति है कि जरा से भी साम्य के सहारे वह सहज ही सम्पूर्ण लयकारी सम्बन्ध जोड़ लेता है।
Comments
Post a Comment