उद्धरण - 898
स्त्री हमेशा से अपने को मिटाती आयी है। ज्ञान सब उसमें संचित है, जैसे धरती में चेतना संचित है। पर बीज अंकुरित होता है, धरती को फोड़कर, धरती अपने आप नहीं फूलती-फलती। मेरी भूल हो सकती है, पर मैं इसे अपमान नहीं समझती कि सम्पूर्णता की ओर पुरुष की प्रगति में स्त्री माध्यम है- और वही एक माध्यम है।
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