उद्धरण - 856

यह भी मैं कह चुका हूँ कि जेल में आदमी स्वाभाविक ढंग से नहीं रहता या सोचता, उसका तर्क विकृत होता है। तब मेरी बात का क्या मोल? मेरे तो कुछ एक सूत्र हैं, जो मैनें अपनी तसल्ली के लिए गढ़ लिए हैं।

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