उद्धरण - 976
शेखर उस पहाड़ी रास्ते से उतरता हुआ चला जा रहा था। उसके कदम अपनी अभ्यस्त साधारण गति से पड़ रहे थे, वह किसी प्रकार की जल्दी नहीं कर रहा था, क्योंकि यद्यपि वह अपने में में उसे स्वीकार नहीं कर रहा था, तथापि उसके भीतर कहीं उसकी आत्मा के छिपे-से-छिपे स्तर में लिपटी हुई कहीं, इस बात की पूर्ण अनुभूति थी कि वह व्यर्थ जा रहा है, कि उसी माँ तो मर चुकी है, कि अब डॉक्टर आकर कुछ नहीं कर सकता- सिवाय इसके कि एक क्रिया को, जो पूर्ण हो चुकी है, अपने विशेष ज्ञान द्वारा एक और पूर्णता, एक अन्तिमत्व दे दे, एक विशिष्ट महत्व जिसे जानकर वे सब- शेखर, शेखर के पिता, शेखर के भाई रो पड़ें।
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