उद्धरण - 623

ऊंटों के साथ घूमनेवाले बनजारों से भी गई-गुजरी जिंदगी हो गई है हमारी। इन लोगों का परिवार कम से कम साथ तो रहता है। हमारे नसीब में तो उतना भी नहीं। क्या होगा ऐसा धन कमा के? रुखी-सूखी खाकर क्या आदमी नहीं जी सकता? परदेश की पूरी रोटी तै घर की आध भली।

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