उद्धरण - 690

साहित्य और कला के सैकड़ों अर्ध-प्रौढ़ आलोचकों की तरह सिर हिलाकर, अपनी राय देने से कतराते हुए, वह बोला, ‘भैया रंगनाथ, पहले के लोगों का हाल न पूछो। यहीं ठाकुर दुरबीनसिंह थे। मैंने उनके दिन भी देखे हैं। पर आजकल के लौण्डों के भी हाल न पूछो!

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549