उद्धरण - 630
मैंने सुना, मालती एक बिल्कुल अनैच्छिक, अनुभूतिहीन, नीरस, यन्त्रवत्- वह भी थके हुए यन्त्र के से स्वर में कह रही है, ‘‘चार बज गए’’ मानो इस अनैच्छिक समय गिनने-गिनने में ही उसका मशीन-तुल्य जीवन बीतता हो ।
जब आठवें दिन उसके पिता ने पूछा, ‘‘किताब समाप्त कर ली?’’ तो उत्तर दिया, ‘‘हाँ, कर ली,’’ पिता ने कहा, ‘‘लाओ, मैं प्रश्न पूछूंगा’’ तो चुप खड़ी रही । पिता ने फिर कहा, तो उद्धत स्वर में बोली, ‘‘किताब मैंने फाड़कर फेंक दी है, मैं नहीं पढ़ूँगी।’’........ वही उद्धत और चंचल मालती आज कितनी सीधी हो गई है, कितनी शान्त, और एक अखबार के टुकड़े को तरसती है...........
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