उद्धरण - 982
हम लोग जंगल में पहुँच गए। पहले गीली-गीली; धरी-धरी ओस से दुधिया घास- उससे भी मैंने चलते-चलते बात कर ली कि वाह, ऊपर से तो चिपटी-चिपटी दूध-धुली साधु बाबा, भीतर ही-भीतर उमंगों से कितनी हरी हो रही है, क्या कहा है किसी ने, अरमान मचलते हैं- फिर झाड़ियाँ शुरू हो गयीं, फिर छोटे पेड़, फिर न जाने कब जंगल चुपके से घना हो गया ।
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