उद्धरण - 949

ईश्वर ने सृष्टि की। सब ओर निराकार शून्य था, और अनन्त आकाश में अन्धकार छाया हुआ था। ईश्वर ने कहा ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश हो गया। उसके आलोक में ईश्वर ने असंख्य टुकड़े किये और प्रत्येक में एक-एक तारा जड़ दिया। तब उसने सौर-मण्डल बनाया, पृथ्वी बनाई। और उसे जान पड़ा कि उसकी रचना अच्छी है। तब उसने वनस्पति, पौधे, झाड़-झंखाड़, फल-फूल, लता-बेलें लगाई, और उन पर मंडराने को भौंरे और तितलियाँ, गाने को झींगुर भी बनाए।..... लेकिन उसे शान्ति न हुई। तब उसने जीवन में वैचित्र्य लाने के लिए दिन-रात, आँधी-पानी, बादल-मेह, धूप-छाँह इत्यादि बनाये और फिर कीड़े-मकोड़े, मकड़ी-मच्छर, बर्रे-बिच्छू और अंत में साँप भी बनाए। लेकिन फिर भी उसे सन्तोष नहीं हुआ। तब उसने ज्ञान का नेत्र खोलकर सुदूर भविष्य में देखा। अन्धकार में पृथ्वी और सौर-लोक पर छाई हुई प्राणहीन धुन्ध में कहीं एक हलचल, फिर उस हलचल में धीरे-धीरे एक आकार, एक शरीर जिसमें असाधारण कुछ नहीं है, फिर भी सामर्थ्य है, एक आत्मा जो निर्मित होकर भी अपने आकार के भीतर बँधती नहीं, बढ़ती ही जाती है। एक प्राणी जो जितनी बार धूल को छूता है, नया ही होकर, अधिक प्राणवान होकर उठ खड़ा होता है।

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