उद्धरण - 799
कहना आसान है! माँ-बाप की इच्छा के खिलाफ मैं कैसे जाऊँ! उन्होंने मुझे पाला-पोषा, बड़ा किया, पढ़ाया, क्या उनके प्रति मेरा कोई ऋण नहीं है? मैं इस बुढ़ापे में उन्हें चोट नहीं पहुँचा सकता। तुम इसे कायरता समझो, मैं नहीं समझता। तुम-सा हृदयहीन मैं न हूँ, न होना चाहता हूँ। लेकिन बीस वर्ष तक मेहनत करके उन्होंने तुम्हें इस लायक बनाया कि तुम अपने पैरों पर खडे़ हो सको, स्वाधीन हो सको, क्या उसके प्रति तुम्हारा ऋण नहीं है? मानवता के प्रति तुम्हारा ऋण नहीं है? कल्पना करो कि बीस वर्ष बाद माता-पिता यह पायें कि हमने अब तक एक नर नहीं, एक भेंड़ की सेवा की है।
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