उद्धरण - 977

प्यार के पथ पर उनका दिमाग़ कुलाचें भरने लगता था। और कल्पना ही कल्पना में वह उस लड़की के लिए अपनी जान दे देते थे। इस प्रकार वह जाने कितनी बार गुंडों से लड़ते हुए शहीद हो चुके थे और जाने कितनी बार प्रेमिका सर्पदंश की शिकार बनने पर उसका ज़हर ख़ुद चूस कर मरे थे। यह सही है कि तब वह बलवंत कौर से विछोह से उत्पन्न दुख, उसके प्यार, उसकी विदाई से बिंध कर तड़प उठते थे, उन्हें जीवन निस्सार तथा भार महसूस होने लगता था लेकिन वह इसी भावनात्मक यातना में रहना भी चाह रहे थे। इस पीड़ा में उन्हें एक अवर्णनीय तृप्ति की अनुभूति होती थी। उन्हें असहायता के साथ साथ एक विलक्षण आनंद भी प्राप्त होता था। इसलिए उन्होंने वैसे ही जीवन का वरण कर लिया था।

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