उद्धरण - 640
मैं अपने विवाह को विवाह कभी नहीं मान सका हूँ- ऐसा विवाह सन्तान को जायज करने की रस्म से अधिक कुछ नहीं है, न हो सकता है। मैं अलग हूँ, अपने को अलग और मुक्त मानता हूँ, और मेरा परिवार भी मुझ से न कुछ चाहता है, न कुछ अपेक्षा रखता है सिवाय खर्चें के जो मैं भेजता हूँ और भेजता रहूँगा।
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