उद्धरण - 839
जैसे कोई नक़ली सूर्य, गौरव घर से दूर हों- असली उसके पास रह गये हों। वह उनकी गिरफ़्त से आज़ाद नहीं हो पाती थी। वह उन दोनों की ख़ुशी, रुचियों, अनिच्छाओं, नाराज़गी इत्यादि की चहलपहल में जा गिरती थीं और उस गहरी खाईं से तभी उबर पाती थी जब वे घर वापस आ जाते थे।
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