उद्धरण - 841
मैं क्यों हार माँनू? कोई विश्वास नहीं करता, न करे। मैं योग्य हूँ। योग्य बनूँगा, रहूँगा। इस चोट को चुपचाप सहूँगा, इस अपमान को पिऊँगा।
अच्छा होता कि मैं कुत्ता होता, चूहा होता, दुर्गन्धमय कीड़ा-कृमि होता- बनिस्बत इसके कि मैं वैसा आदमी होता, जिसका विश्वास नहीं।
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