उद्धरण - 629

मुझे मालूम होता है कि मैं अपने को खो सका हूँ तभी सफल वकील और बड़ा जज बन सका हूँ, इतनी उम्र बिताकर बहुतों को मरते और उनसे बहुतों को जीते देखकर अगर मैं कुछ चाहता हूँ तो वह यह है कि भीतर का दर्द मेरा इष्ट हो। धन न चाहूँ, मन चाहूँ। धन मैल है। मन का दर्द अमृत है।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549