उद्धरण - 628
मैंने देखा है कि सब प्रचार अन्ततः घृणा का प्रचार है, क्योंकि घृणा में शक्ति है, प्यार में वह नहीं है। वैसे ही जैसे विष में शक्ति है। लड़ाई लड़ी जाती है, जिहाद होते हैं, तो घृणा के सहारे......और घृणा सचमुच विष है। वह दूसरे को भी मारती है, अपने को भी नहीं छोड़ती।
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