उद्धरण - 960
फिर एक सूनापन उसके मन में छा गया, आँखें अनदेखती हो गईं.....उस शून्य में वह धीरे-धीरे शशि से सुने शब्द गुनगुनाने लगा-
‘दुख साड्डा समझनगे, दो पत्थर पहाडाँ दे--
‘पत्थर क्यों समझेंगे दुख’- शायद यही अभिप्राय है कि उस दुख को कोई नहीं समझ सकता, दो पत्थर पहाड़ाँ दे ......किन्तु पत्थर पहाड़ों के हैं, जिन्होंने सदियों तक बर्फीली ऑधियों के प्यासे प्यार के नीचे चोटियों को छीजते देखा है।
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