उद्धरण - 966

यदि हम इस उद्यान के रंग-बिरंगे, सूखे-गीले, चल-अचल विस्तार से परे देख सकते, तो शायद इसके भीतर भी हमें किसी के पैर के आकार की प्रतिकृति दीख पड़ती, इस पर भी किसी के हाथों की छाप पहचानी जा सकती। किसी भी बड़े कवि का जीवन ले लो, उसकी सारी जिन्दगी एक खोज है जिसका नतीजा केवल इतना है कि ‘नहीं । यह नहीं । यह भी नहीं । यह भी नहीं ।’

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