उद्धरण - 902
पीटने की धम्म धम्म आवाज़ें ज़रुर हो रही थीं पर वे मुझे नहीं मैं उनको पीट रही थी। मुझ पर ख़ून सवार हो गया था। जाने कहां की हिम्मत आ गयी थी। लेकिन उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला और न दूसरे को खोलने दिया। कहा किसी ने दरवाज़ा खोला तो वह अपने पेट में चाकू घोंप लेंगे। बस यहीं मैं हार गयी। वह मुझे मार डालेंगे, इस धमकी से डर लगता है पर इससे बहुत ज़्यादा ख़ौफ़नाक है यह धमकी कि वह अपने को मार डालेंगे।
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