उद्धरण - 915

हाँ ! सत्य सापेक्ष्य ही है। निरपेक्ष वह हो ही कैसे सकता है? निरपेक्ष तो चीजें हैं-पदार्थ। पदार्थ सत्य नहीं है, निरा पदार्थ। सत्य तो पदार्थ का हमारा बोध है- और बोध व्यक्तिगत है।

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