उद्धरण - 731
जिस प्रकार क्रोध में वे छोटे को छोटा नहीं समझते, उसी प्रकार क्रोध के उतरने पर भी....कितनी स्वच्छ, एहसान के भाव से मुक्त, कितनी विशाल सर्वव्यापी होती है उनकी उदारता! इसीलिए शेखर पिटकर भी उन्हें पूजता है, जैसे वह माँ को कभी नहीं पूज सकता, माँ जो पीटती नहीं, पर जो ‘क्षमा’ देती है अनुग्रह की चक्की में पीसकर.....
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