उद्धरण - 954

घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए विज़न को शब्द बद्ध करने का प्रयत्न है। इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप ‘एक आदमी की निजू बात’ कहकर उड़ा सकें, मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है।

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