उद्धरण - 962

इस घर से मेरे निष्कासन के वक़्त वह वर्चस्व, वह चीख मेरी बाहों पर उस कलाई की सख़्त बेरहम पकड़, वह रुआब, वह शारीरिक बल, वरिष्ठता का वह दम्भ- उन सभी की अब लाचारी, रुग्णता, निर्बलता में यह परिणति- मेरा इंतकाम, मेरी गौरी के अपमान का बदला पूरा हुआ। वह ख़ुश और विजेता होने की अनुभूति में उतर ही रहा था कि उसे लगा : इनकी यह स्थिति मेरे इंतक़ाम की वजह से नहीं है, यह मेरे प्रतिशोध नहीं कुदरत के नियम से है। वह हताशा से भर उठा और उसमें भावनात्मक हिंसा की प्रबल भावना उभरीं

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