उद्धरण - 979

मैं जहाँ हूँ, वहाँ से कभी हिली नहीं । एक बार, कभी किसी ने मुझे बना दिया था, तब से मैं वैसे ही चली आ रही हूँ । कभी-कभी लोग आकर में अलंकार-भूषण बदल जाते हैं अवश्य, मुझे नई कड़ियाँ, नई श्रृंखलाएँ ओर नये पट दे जाते हैं, मेरे मुँह और वक्ष पर नया आलेप कर जाते हैं, पर इससे मौलिक और प्रत्यक्ष एक रूपता नहीं बदलती- वैसे ही जैसे स्त्री के आवरण और अलंकार बदल देने पर भी उसका रूप वही रहता है........पर ऐसा होते हुए भी मैंने दुनिया देखी है और देखती हूँ, दुनिया के अनुभव सुने हैं और सुनती हूँ और इसके अतिरिक्त अपने प्रगाढ़ अकेलेपन में मैंने एक और शक्ति पाई है- मैं आत्माएँ पढ़ती हूँ । मेरे पास जो आता है, मैं उसे आर-पार देख-पढ़ और समझ लेती हूँ ।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549